सैरपुर हॉस्पिटल प्रसव मौत मामला: पांच दिन बाद भी कार्रवाई शून्य, वादों और पैसे की राजनीति पर सवाल
- Kumar Nandan Pathak
- 6 दिन पहले
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लखनऊ – सैरपुर थाना क्षेत्र के सन राइज हॉस्पिटल में प्रसव के दौरान 25 वर्षीय महिला अनुष्का की मौत ने पूरे शहर को हिला कर रख दिया। लेकिन पांच दिन बीत जाने के बावजूद न तो कोई अभियोग दर्ज हुआ और न ही अस्पताल या जिम्मेदार अधिकारियों पर शिकंजा कसा गया, जिससे स्वास्थ्य प्रशासन और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों और परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने केवल पहुंच और पैसे वाले मामलों में प्राथमिकता दी। घटना के समय न तो कोई विशेषज्ञ डॉक्टर, न एनेस्थेटिस्ट, न ही लैब तकनीशियन मौजूद थे। इसके बावजूद मरीज से पहले ही 50 हजार रुपये जमा करने की मांग की गई, लेकिन पर्याप्त और समय पर इलाज नहीं दिया गया।
परिजन हताश और गुस्साए हुए, हाईवे पर शव रखकर प्रदर्शन करने को मजबूर हो गए। इस कारण कई घंटों तक इलाके में जाम लग गया। मौके पर सैरपुर और बीकेटी पुलिस ने स्थिति को काबू में करने की कोशिश की, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती और संज्ञान लेने में देरी ने लोगों का गुस्सा और बढ़ा दिया।
मुख्यमंत्री ने कई मौकों पर मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के वादे किए हैं। लेकिन यह मामला साबित करता है कि वास्तविकता में वादों की स्थिति कितनी कमजोर है। पांच दिन बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई न होना यह दिखाता है कि सिस्टम में जवाबदेही केवल कागजों तक ही सीमित है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस घटना में स्पष्ट है कि पैसे और पहुंच वाले मामलों को प्राथमिकता देना, मरीजों की सुरक्षा पर भारी पड़ सकता है। प्रशासनिक सुस्ती और अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही ने इस घटना को जन्म दिया।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि CMO, अस्पताल प्रबंधन और पुलिस सभी की जवाबदेही सवालों के घेरे में है। आरोप है कि पैसे लेकर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि पांच दिन बीत जाने के बावजूद किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों का कहना है कि केवल जांच कमेटी बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई, अस्पताल में मानक प्रक्रियाओं की निगरानी और मरीजों के अधिकारों की सुरक्षा अब तत्काल जरूरी है।
परिजन और सामाजिक संगठन न्याय की मांग में अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि यह मामला दिखाता है कि सिस्टम में गंभीर कमी है और मरीजों की सुरक्षा कई बार पैसे और पहुंच पर टिकी रहती है।
सवाल उठता है कि क्या पांच दिन बाद भी कोई कार्रवाई नहीं दिखाकर स्वास्थ्य और पुलिस प्रशासन यह साबित करना चाहता है कि गरीब और आम मरीजों की सुरक्षा केवल कागजों में ही सुरक्षित है, जबकि वादों और भाषणों की दुनिया अलग है।
सैरपुर हॉस्पिटल मामला न केवल बीकेटी क्षेत्र बल्कि पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य प्रशासन और कानून व्यवस्था की जवाबदेही को चुनौती देता है। अब नागरिक और मीडिया दोनों यह देख रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री के वादों के बावजूद प्रशासन वास्तविक कार्रवाई करेगा या पैसे और पहुंच के आगे मरीजों की जान और सुरक्षा को नजरअंदाज किया जाएगा।


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